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त्रिवेंद्र सरकार ने पेश किया 48663.90 करोड़ रु का बजट -

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एक हीरो जो फिल्में छोड़ कर बना था सन्यासी

तब आज की तरह बॉलीवुड स्टार शायद ही कभी प्रेस कांफ्रेंस बुलाते थे ये 1982 का समय था, विनोद खन्ना ने जब मुंबई के होटल सेंटूर में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई तो मीडिया के लिए ये हैरानी की बात थी, क्योंकि. विनोद खन्ना महरून रंग का चोला और ओशो की तस्वीर वाली मनकों की माला पहनकर आए. साथ में थीं उनकी पहली पत्नी गीतांजलि और दोनों बेटे अक्षय और राहुल. अंदाज सबको था कि विनोद क्या कहने वाले हैं. क्योंकि तब बॉलीवुड में नंबर दो स्टार विनोद खन्ना ने नई फिल्में लेनी बंद कर दी थीं. विनोद वर्ष 70 के दशक में आचार्य रजनीश से प्रभावित होने लगे थे. 1975 के ठीक आखिरी दिन वह रजनीश आश्रम में संन्यासी बन गए. इससे पहले उन्होंने घंटों रजनीश के वीडियो देखे. उनके साथ समय बिताया. 70 के दशक के आखिरी सालों में वह सोमवार से लेकर शुक्रवार तक बॉलीवुड में काम करते. फिर उनकी मर्सीडिज कार पुणे की ओर भागती नजर आती. सप्ताहांत के दो दिन पुणे के ओशो आश्रम में गुजरते. जहां पहले तो वह होटल में रुकते थे. फिर आश्रम में ही ठहरने लगे. आश्रम में जैसे ही वह अंदर पैर रखते, उनका स्टार का चोला उतर जाता, वह रजनीश के दूसरे शिष्यों की तरह हो जाते. उन दो दिनों में ध्यान और अन्य आश्रम कार्यक्रमों के बाद उन्हें बगीचों की सफाई के काम में तल्लीन देखा जाता. आश्रम के बाहर उनका ड्राइवर कार के साथ खड़ा होता. वह अंदर जमीन पर गिरे सूखे पत्ते उठाकर कूड़ेदान में डालते देखे जाते. आश्रमवासियों के बीच वह स्वामी विनोद भारती थे, उन्हीं सबकी तरह. सबसे मुस्कुराकर आत्मीयता से मिलने वाले. बॉलीवुड के पुराने फिल्म पत्रकार याद करते हैं कि किस तरह विनोद शूटिंग पर भी रजनीशी चोले में पहुंचते थे. इसे तभी उतारते जब सेट शॉट के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता. मिलने वालों से यही कहते, रजनीश धरती पर इकलौते जीवित भगवान हैं. 80 के दशक की शुरुआत में पुणे के रजनीश आश्रम में दिक्कतों की खबरों आने लगी थीं. स्थानीय प्रशासन का रुख कड़ा था. रातों-रात रजनीश के अमेरिका के ओरेगान जाने की खबर आई. वह प्रिय शिष्यों को वहां साथ रखना चाहते थे. विनोद खन्ना से भी चलने को कहा. 1985 में फिर एक दिन वह वापस लौट आए. एक भारतीय पत्रिका के कवर पर सफेद दाढी में उनकी तस्वीर छपी. कई तरह की बातें उड़ीं. मसलन – उनके पास पैसा खत्म हो चुका है. रजनीश से उनके मतभेद हो गए हैं. दरअसल वर्ष 85 उथल-पुथल भरा था. बचपन की दोस्त गीतांजलि, जिससे शादी की थी, उससे तलाक गया. रजनीश को अमेरिकी सरकार ने वापस भेज दिया था. वह रजनीश से ओशो के रूप में रूपांतरित होकर 1987 में वापस पुणे लौट आए. 27 अप्रैल 2017 को जब मुंबई में विनोद खन्ना का निधन हुआ. तो ओशो आश्रम की आधिकारिक वेबसाइट पर उसी दिन एक सूचना प्रसारित हुई, हम स्वामी विनोद भारती की याद में कोरेगांव पार्क में एक संगीतमय कीर्तन आयोजित करेंगे. आश्रम की पुस्तिका पर ओशो संन्यासियों ने अपने अनुभवों को लिखकर उन्हें याद किया.

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