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Thursday, May 28, 2020

तम्बाकू सेवन की आदत से बचने की अपील

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देहरादून । मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने विश्व तम्बाकू निषेध दिवस की पूर्व संध्या पर जारी अपने संदेश में प्रदेशवासियों से तम्बाकू सेवन की आदत से बचने की अपील की है। उन्होंने कहा कि तम्बाकू एक ऐसा जहर है, जो शारीरिक रूप से तो हानिकारक है ही, साथ ही, इसके सामाजिक व आर्थिक दुष्प्रभाव भी पड़ते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ व विकसित राष्ट्र के निर्माण का आधार है। उन्होंने कहा कि तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी गुटखा आदि की आदत को छोड़ने के लिए हमें संकल्प लेकर प्रदेश व राष्ट्र के विकास में भागीदार बनना होगा।

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यह पायलट प्रोजेक्ट दिखाता है युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी बढ़ती भागीदारी को

देहरादून । उत्तराखंड में युवा, जो मानसिक परेशानी का अनुभव करते हैं (जिसे मनो-सामाजिक विकलांगता भी कहा जाता है) अक्सर उन्हें कलंक, बहिष्कार का अनुभव करना पड़ता है और जहां वे रहते हैं, उनके स्कूलों और समुदायों में उनके साथ भेदभाव किया जाता है। इमैनुएल हॉस्पिटल एसोसिएशन और मेलबोर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में शोध को प्रकाशित किया है जिसमें मनो-सामाजिक विकलांगता वाले 142 युवाओं के बीच एक कार्यक्रम (नई दिशा-2) की प्रभावशीलता को दिखाता है, जिसने समुदाय में उनके समावेश को बढ़ाया और उनके मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लेकर आया। अधिकांश युवा, देहरादून शहर या उसके आस-पास के इलाकों, कुछ मलिन बस्तियों और कुछ देहरादून जिले के ग्रामीण इलाकों में जैसे सहसपुर रहते हैं। देहरादून जिले में रहने वाली डॉ. कैरन माथियास ने बताया कि “मानसिक-सामाजिक विकलांगता पूरे भारत भर में बहुत बड़ी समस्या है। वास्तव में मानसिक बीमारी भारत के 600 मिलियन युवाओं में खराब स्वास्थ्य का सबसे बड़ा कारण है,” “लेकिन समूह की बैठकों और नई दिशा के मॉड्यूल में भाग लेने से, हमने कई युवाओं को अच्छी चीजों में बदलते हुए देखा, जो कि वास्तव में उत्साहजनक था। सामाजिक समावेश को बढ़ाने के लिए पूरी दुनिया में लगभग कोई अध्ययन नहीं हुआ है।”
अध्ययन में भाग लेने वाली युवा महिलाओं ने बताया कि उन्हें घर से निकलने और स्वतंत्र रूप से इधर उधर जाने में अधिक आत्मविश्वास महसूस हुआ। एक युवा महिला जो नई दिशा हस्तक्षेप का हिस्सा थी, उसने कहा कि “इससे पहले, स्कूल जाने के लिए मेरी माँ मेरे साथ जाती थी और मुझे लेने के लिए भी उसे आना पड़ता था, लेकिन समूह में शामिल होने के बाद मैंने उससे कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, और अब मैं खुद से स्कूल आती-जाती हूँ।“युवा महिलाओं ने यह भी महसूस किया कि वे नई चीजों को शुरू करने में सक्षम हैं जैसे ओपन स्कूलिंग से कक्षा दस के अध्ययन को पूरा करना और कई युवा महिलाओं ने समूह में भागीदारी के बाद रोजगार भी शुरू किया।

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