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एक गांव ऐसा भी जहां केवल दो वृद्ध दंपत्ति कर रहे जीवन यापन

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रुद्रप्रयाग। गांवों का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। गांवों से पलायन लगातार जारी है। कई हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर पड़ी हुई है। बच्छणस्यूं क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां काश्तकारों ने एक जोड़ी बैल तक नहीं पाली है। जबकि दो गांव चामियूं और पौड़ीखाल ऐसे हैं, जहां मात्र एक-एक दपंत्ति निवास कर रहे हैं। गांव पूरी तरह से खंडर में तब्दील होते जा रहे हैं। कुद वर्ष पूर्व होली-दीपावली पर ग्रामीण गांव आते भी थे, लेकिन अब बाहर रह रहे ग्रामीणों की आवाजाही पर पूर्णतः से रोक लग गई है। सुख-सुविधाओं के अभाव में पहाड़ के कई गांव आज खाली होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में न तो मोटरमार्ग की सुविधा है और ना ही स्वास्थ्य एवं बिजली की। ऐसे में ग्रामीण जनता गांव में नहीं रहना चाहती है। विकासखण्ड अगस्त्यमुनि के अंतर्गत चामियूं, पौड़ीखाल, ढिगंणी, कपलखील, निसनी, बंगोली आदि ऐसे गांव हैं जहां से अधिकांश ग्रामीण पलायन कर चुके हैं। उक्त गांवों के ग्रामीण आज भी तीन किमी खड़ी चढ़ाई पार करके रोजमर्रा की सामग्री पीठ में ढ़ोने को मजबूर हैं। आजादी के बाद से ग्रामीण लगातार मोटरमार्ग निर्माण की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन आज तक ग्रामीणों की मांग पर अमल नहीं हो पाया है। समय≤ पर सत्ता में बैठने वाली भाजपा एवं कांग्रेस सरकार के मंत्री-विधायकों को उक्त गांवों के नाम तक मालूम नहीं हैं। ग्रामीणों के मुताबिक चुनाव के दौरान ही नेता यहां आते हैं और वोट की खातिर विकास के दावे करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई दर्शन तक नहीं देता है। इसके साथ ही विभागीय योजनाओं की जानकारी ग्रामीणों को नहीं मिल पाती है। मोटरमार्ग न होने के कारण ग्रामीणों का संपर्क देश-दुनिया से कटा हुआ है। क्षेत्र के कपलखील, ढिंगणी, चमियूं, पौड़ीखाल, निषणी, बंगोली तैली, बंगोली सीली आदि ऐसे गांव हैं, जहां एक जोड़ी बैल तक नहीं हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव में कोई रहता ही नहीं है तो बैल पालकर क्या करना। यदि खेती करते भी हैं तो बंदर, सुअर और भालू फसलों को नुकसान पहुंचा देते हैं। ऐसी स्थिति में खेती करने से ग्रामीणों को कुछ लाभ नहीं मिल पाता है। वहीं चामियूं और पौड़ीखाल ऐसे गांव हैं जहां मात्र एक-एक वृद्ध दंपत्ति जीवन गुजार रहे हैं। इनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है। लड़के बाहरी शहरों में जीवन यापन कर रहे हैं। गांव में रह रहे व्यक्ति आलम सिंह का कहना है कि कुछ वर्षों पूर्व अन्य ग्रामीण त्यौहारों पर गांव का रूख करते थे, लेकिन विगत एक-दो सालों में ग्रामीणों ने गांव आना छोड़ दिया है। मोटरमार्ग न होने के कारण सबसे अधिक दिक्कतें हो रही हैं। कभी गांव की चैपालें खुशियों से भरी रहती थी, लेकिन आज वही चैपाले खण्डर में तब्दील हो गई हैं। स्थिति यह है कि ग्रामीण अपने पुस्तैनी आवासीय भवनांे की सुध तक लेने नहीं पहुंचते हैं। जिस कारण अधिकांश भवन खण्डर में तब्दील हो गये हैं।

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