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उत्तराखण्ड का पौराणिक लोकपर्व हरेला : प्रकृति पूजन और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक

 

उत्तराखंड(अंकित तिवारी) | उत्तराखण्ड के पौराणिक लोकपर्व हरेला का महत्त्व सदियों से प्रदेशवासियों के जीवन में विशेष स्थान रखता है। हरियाली और सुख-समृद्धि का प्रतीक यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके पर्यावरणीय महत्त्व को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हरेला के माध्यम से हम प्रकृति के साथ अपने जुड़ाव को न केवल महसूस करते हैं, बल्कि उसे सहेजने और संवारने का संकल्प भी लेते हैं। हरेला पर्व की शुरुआत विशेष रूप से उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में होती है। इस पर्व की तैयारी दस दिन पहले ही प्रारंभ हो जाती है। घर-घर में मिट्टी के पात्रों में जौ, गेहूं, मक्का आदि के बीज बोए जाते हैं, जो दस दिनों में अंकुरित होकर हरेला के दिन तक छोटे पौधों का रूप ले लेते हैं। यह प्रतीकात्मक हरीतिमा हमारी धरती के प्रति आभार प्रकट करती है और हमें प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा देती है।हरेला का पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति की समृद्धि को बनाए रखने के लिए किस प्रकार के आयोजन किए। उनके द्वारा स्थापित ये परंपराएं आज के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो गई हैं, जब पर्यावरणीय संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है।आज के आधुनिक समय में जब औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण वन्य क्षेत्र तेजी से घट रहे हैं, हरेला पर्व हमें प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता का एहसास कराता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटकर, अपने परिवेश को हरा-भरा रखने का प्रयास करना चाहिए। पौधारोपण के माध्यम से हम न केवल अपने पर्यावरण को संरक्षित कर सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित कर सकते हैं।इस हरेला पर्व पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम अधिक से अधिक पौधे लगाएंगे और उनकी देखभाल करेंगे। यह न केवल हमारे पर्यावरण को हरा-भरा बनाएगा, बल्कि हमारी धरोहर, हमारी परंपरा को भी सजीव रखेगा। आइए, हम सभी मिलकर इस पर्व को और भी व्यापक रूप से मनाएं और पर्यावरण संरक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं। हरेला की हरियाली हमें यह संदेश देती है कि हम अपनी धरती को हरा-भरा रखकर ही सच्चे अर्थों में सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। इस पर्व की महत्ता को समझें और इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएं।

इस लेख के लेखक अंकित तिवारी शोधार्थी,अधिवक्ता एवं पूर्व विश्वविद्यालय प्रतिनिधि हैं …

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