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दून में स्कूली बच्चों की परिवहन सुविधा भगवान भरोसे

देहरादून । स्कूली बच्चों की परिवहन सुविधा एवं उनकी सुरक्षा दून में भगवान भरोसे चल रही है। कहीं हॉस्टल में छात्रा से दुष्कर्म जैसी संगीन घटनाएं सामने आ रही है तो स्कूली वाहन में छात्रा के यौन-उत्पीड़न की। ना इसकी परवाह जिम्मेदार सरकार, प्रशासन व परिवहन विभाग को है, न ही मोटी फीस वसूलने वाले स्कूल प्रबंधन को। निजी स्कूल बसों के साथ ही ऑटो व वैन चालक क्षमता से कहीं ज्यादा बच्चे ढोते हैं। अभिभावक भी इन हालात से अंजान नहीं हैं, लेकिन दिक्कत ये है कि स्कूलों ने विकल्पहीनता की स्थिति में खड़ा किया हुआ है। निजी स्कूल यह जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं। उन्हें न बच्चों की परवाह है, न अभिभावकों की। बच्चे कैसे आ रहे या कैसे जा रहे हैं, स्कूल प्रबंधन को इससे कोई मतलब नहीं। अभिभावक इस विकल्पहीनता की वजह से निजी बसों या ऑटो-विक्रम को बुक कर बच्चों को भेज रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की गाइड-लाइन में स्कूली वाहनों में पांच साल तक के बच्चों को मुफ्त ले जाने का प्रावधान है। तय नियम में स्पष्ट है कि ये बच्चे सीट की गिनती में नहीं आते। इसी नियम का फायदा उठाकर वाहन संचालक ओवरलोडिंग करते हैं और चेकिंग में पकड़े जाने पर आधे बच्चों की उम्र पांच साल से कम बताते हैं। यही नहीं कहीं पर भी पांच साल तक के बच्चों को मुफ्त ले जाने के नियम का अनुपालन नहीं किया जाता। स्कूल वाहन का रंग सुनहरा पीला हो, उस पर दोनों ओर और बीच में चार इंटर मोटी नीले रंग की पट्टी हो स्कूल बस में आगे-पीछे दरवाजों के अतिरिक्त दो आपातकालीन दरवाजे हों। सीटों के नीचे बैग रखने की व्यवस्था हो। बसों व अन्य वाहनों में स्पीड गवर्नर लगा हो। एलपीजी समेत सभी वाहनों में अग्निशमन संयंत्र मौजूद हो। पांच साल के अनुभव वाले चालकों से ही स्कूल वाहन संचालित कराया जाए। स्कूल वाहन में फस्र्ट एड बॉक्स की व्यवस्था हो।

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