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पहचान : कॉन्वेंट स्कूलों की टीमों पर भारी पड़ रहे झुग्गी बस्ती के बच्चे

चंडीगढ़ । जब दिल मे सच्ची चाहत हो तो कोई भी कार्य मुमकिन नही हो सकती जी हाँ ऐसा ही कर दिखाया है इन बच्चों के कोच शिवेंद्र अरोड़ा हैं। फुटबॉलर बनने का सपना खस्ता आर्थिक हालात के कारण पूरा तो नही कर पाए लेकिन अपने सपने को बरकरार रखते हुए उन्होंने स्लम के बच्चों को सिखाना शुरू किया। वे ही बच्चों की इस टीम को पहली बार एसोसिएशन के मैदान तक लेकर गए थे। बच्चों की छोटी-मोटी जरूरत वे अपने स्तर पर पूरी करते हैं। चंडीगढ़ फुटबॉल एसोसिएशन ने स्लम के बच्चाें की टीम को ‘इंडियन चीताज’ यही नाम दिया है। इस टीम में चंडीगढ़ और आसपास की कच्ची बस्ती के 50 बच्चे खेलते हैं। चीताज नाम इसलिए, क्योंकि जब ये दौड़ते हैं, तो लगता है जैसे हवा से बातें कर रहे हैं। यह टीम प्रोटीन डाइट और महंगे जूते, टी-शर्ट इस्तेमाल करने वाली कई कॉन्वेंट स्कूलों की टीमों पर भारी पड़ रही है। इनका खेल देखकर एसोसिएशन किसी भी इवेंट में इनसे एंट्री फीस नहीं लेता। घर से लाई मां के हाथ की बनी रोटियां इनकी ताकत बनती है। फुटपाथ पर बिकने वाली टी-शर्ट और साधारण 200-300 रुपए वाले जूते पहनते हैं। इस टीम के कुछ बच्चे आज भी नंगे पैर हैं। जो बच्चे लगातार अच्छा खेल रहे हैं, उन्हें एसोसिएशन ने फुटबॉल किट दी है। कुछ की मदद अन्य टीमों के बच्चों ने भी की है। वे अपने जूते और दूसरे सामान इन्हें दे देते हैं। हाल ही में इस टीम का शुभम अंडर 15 राष्ट्रीय टीम में चुना गया है। शुभम अभी 14 साल का है और उसके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। इसी तरह 12 साल का चंदनपाल 3 साल से टीम में है। पांचवीं में पढ़ता है। उसके पिता ददन कुमार दूध बेचते हैं। टीम के सईम और आदित्य के पिता सब्जी बेचते हैं। टीम के ज्यादातर बच्चों के घर के हालात ऐसे ही हैं।

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