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चल पड़ी ‘बरेली की बर्फी’

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डायरेक्टर अश्विनी अय्यर तिवारी की फ़िल्म ‘बरेली की बर्फी’ का ‘थॉट’ यह है की इंसान हमेशा हीरो नहीं रह सकता कभी वो नायक होता है तो कभी उसमें नकारात्मक प्रवृतियां भी पनपती हैं और जिसका मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लक्ष्य में सफ़ल होना होता है। इस प्रवित्ति को लेकर खूबसूरत ढंग से अश्विनी ने फ़िल्म में पिरोया है। बरेली की रहने वाली बिट्टी मिश्रा अपने आप में एक मस्त लड़की है उसके मां-बाप को उसकी शादी की चिंता है। बिट्टी सिगरेट पीती है, रातों को देर से लौटती है, छत पर डांस करती हैं। यानी उसमें वो हर दुर्गुण है जो अपने सामजिक ढांचे के लिहाज से एक शादी योग्य लड़की में नहीं होनी चाहिए। आप जानते हैं, लड़कियों और लड़कों को समाज में देखने का नज़रिया कितना अलग है। मापदंड कितने अलग-अलग हैं। ऐसे में बिट्टी के हाथ में एक किताब लगती है- ‘बरेली की बर्फी’, और बिट्टी को पक्का यकीन हो जाता है कि ये किताब उसी की कहानी है। वो लेखक के प्यार में पड़ जाती है। दूसरी ओर प्रेम में चोट खाया चिराग दुबे (आयुष्मान खुराना) अपनी बबली से अपनी प्रेम कहानी पर ‘बरेली की बर्फी’ लिख तो देता है पर उसे अपने नाम से छपवाने के बजाय अपने पिच्छलग्गू दोस्त प्रीतम विद्रोही (राजकुमार राव) के नाम से ज़बरदस्ती छपवा देता है। बिट्टी प्रीतम के प्यार में और अब चिराग बबली को भूलकर बिट्टी के प्यार में दीवाना हो चुका है। आगे क्या होता है? क्या चिराग बिट्टी को पाने में कामयाब होता है या बिट्टी प्रीतम के साथ ब्याह रचायेगी इसी धागे पर बुनी गयी है ये ‘बरेली की बर्फी’। एक छोटे से कस्बे के नायक नायिका की प्रेम कहानी जिसमें हीरो-हीरोइन की तरह कोई महान विशेषताएं नहीं हैं। बड़ी सामान्य सी गली-मोहल्ले की प्रेमकथा भी प्रेमकथा ही होती है। ये डायरेक्टर अश्विनी अय्यर तिवारी ने बड़ी ही खूबसूरती से फ़िल्माया है। कृति सनोन, आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव के साथ-साथ पंकज त्रिपाठी व सीमा भार्गव का जोरदार अभिनय आपको बिट्टी की दुनिया में ज़रूर ले जाएगा।

 

 

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