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उत्तराखंड : सचिवालय ए ने जीता मोनाल कप 2025 का खिताब -

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निशा 6 बार हुई असफल, नहीं हारी हिम्मत बनी आइएएस -

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उत्तराखंड : छोटे-छोटे अपराधों में कारावास की सजा के बजाए अब सिर्फ अर्थ दंड का प्रावधान -

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अंकित तिवारी ने अपने जन्मदिन पर दिया रक्तदान का संदेश, जानिए खबर -

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मोनाल कप : सेमीफाइनल में पहुंची सचिवालय ए और सचिवालय डेंजर्स की टीम -

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Tuesday, December 9, 2025

मोनाल कप 2025 : हरिकेन और सचिवालय ईगल्स टीम की बड़ी जीत -

Tuesday, December 9, 2025

रॉयल स्ट्राइकर्स और सचिवालय ए की टीम मोनाल कप प्रतियोगिता के अगले दौर में पहुंची -

Monday, December 8, 2025

पुष्प वर्षा योग समिति के द्वारा यूनीफॉर्म का हुआ वितरण -

Monday, December 8, 2025

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Saturday, December 6, 2025

मोनाल कप : मैच के अगले दौर में पहुँचे सचिवालय रॉयल स्ट्राइकर, सचिवालय ए , सचिवालय वॉरियर्स और सचिवालय पैंथर -

Saturday, December 6, 2025

नौसेना दिवस-2025 : राज्यपाल ने किया डॉक्यूमेंट्री का विमोचन, नौसेना की भूमिका की सराहना की -

Friday, December 5, 2025

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Friday, December 5, 2025



झोपड़ी में रहकर पढ़ाई की , 17 बार हड्डियां टूटी नही हारी हिम्मत आज है आईआरएस अधिकारी, जानिए खबर

राजस्थान | कहते हैं न कि उड़ान पंखों से नहीं बल्कि हौसलों से होती है, आईआरएस अफसर उम्मूल खैर इसकी मिसाल हैं संघर्ष के कई किस्से सुने होंगे लेकिन उम्मूल के संघर्ष की कहानी सुनकर हर कोई प्रेरित हो जाएगा | एक रूढ़िवादी परिवार में जन्मी उम्मूल ने झोपड़ी में रहकर पढ़ाई की | बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए अपनी फीस का खर्च उठाया और 2017 में यूपीएससी की परीक्षा पास की | लेकिन सब बातें उम्मूल की जिंदगी के संघर्ष और कठिनाइयों के आगे बहुत छोटी हैं | आइए जानते हैं कि झोपड़ी में रहने वाली आईआरएस उम्मूल आज कैसे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा हैं | उम्मूल को बचपन से बोन फ्रेजाइल डिसऑर्डर नाम की बीमारी थी | इस बीमारी में इंसान की हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं और कभी भी टूट सकती हैं | ओस्टियोजेनेसिस की गंभीर बीमारी से पीड़ित उम्मूल की अब तक 17 बार हड्डियां टूट चुकी हैं और उन्हें 8 ऑपरेशन झेलने पड़े हैं | इतनी गंभीर परेशानियों के बावजूद उम्मूल के जज्बे में कभी कमी नहीं आई और उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर यूपीएससी की परीक्षा पास की | उम्मूल खेर का जन्म राजस्थान के पाली में हुआ | परिवार का खर्चा उठाना मुश्किल था, इसलिए रोजगार की तलाश में उम्मूल के पिता दिल्ली आ गए और निजामुद्दीन की झुग्गियों में रहने लगे | झुग्गियों में उम्मूल अपने पिता और सौतेली मां के साथ रहा करती थी | एक वक्त ऐसा आया जब निजामुद्दीन इलाके की झुग्गियां तोड़ दी गईं, इसके बाद बिना किसी छत के सहारे, उम्मूल के परिवार को त्रिलोकपुरी जाना पड़ा | उम्मूल बच्चों को दिन-रात ट्यूशन पढ़ाती थीं और फिर अपनी पढ़ाई भी करती थी | इस बीच उनके पास खाना खाने तक का वक्त नहीं होता था | एक इंटरव्यू में अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उम्मूल ने बताया कि वक्त की कमी के कारण कई बार उन्हें चार दिन पुरानी रोटियां खानी पड़ती थीं जिन पर फफूंद भी आ जाती थी | ऐसी तमाम दिक्कतों के साथ पढ़ाई करने के बाद पहले उम्मूल ने जेएनयू जैसी यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा पास कर ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की इसके बाद अपने पहले ही अटेंप्ट में यूपीएससी निकाला | बोन फ्रेजाइल डिसऑर्डर जैसी गंभीर बीमारी, 8 ऑपरेशन, परिवार और समाज की उपेक्षा और पैसे की कमी के बावजूद देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने वाली उम्मूल अकेली थीं लेकिन अब उनके पास परिवार से लेकर समाज तक सबका साथ है |

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