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फुटबाल खेल : 55 साल का लम्बा सफर, फिर भी देश वर्ल्ड कप में “नो एंट्री”

देहरादून | डेढ़ सौ करोड़ वाला भारत देश विश्व मे जनसंख्या मे चीन के बाद दूसरे नंबर पर, सन 1945 से 1970 का दशक इंडियन फुटबाल का थोड़ा ठीक था कुछ उपलब्धि प्राप्त की थी लेकिन आज 1970 से 2025 यानी की 55 साल का लम्बा सफर देखे तो क्या हम 11 खिलाडी ऐसे खोज नहीं पाए जो वर्ल्ड कप खेलने के लिए क्वालीफाई कर पाए या वर्ल्ड कप खेल पाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्यों कि कभी भी भारत सरकार ने अपना सारा पैसा केवल ज़ब हम गुलाम थे 200 साल इंग्लैंड के उनका प्रिय खेल क्रिकेट को अपना जूनून और शौक पाल लिया कहे तो गोद ले लिया क्रिकेट को और उसके आगे किसी भी खेल को टिकने नहीं दिया सारा धन क्रिकेट मे झोंक दिया फिर कहा टिकने वाला था हमारा प्यारा खेल फुटबाल आल इंडिया फुटबाल फेडरेशन ने कुछ भी इन 55 सालों मे कुछ अच्छा नहीं किया क्यों कि जो भी अध्यक्ष और महासचिव बना उसने केवल पैसे का दुरपयोग किया गया | इंडिया मे अंडर 17 गर्ल्स और बॉयज के वर्ल्ड कप करा दिए इसी बहाने इंडियन टीम को खेलने का मौका मिला परिणाम आया क्या जीरो, एशिया के टूर्नामेंट मे कभी कबार जीत गए गलती से तो ख़ुशी मनाने लगे, भारत की महिला और पुरषों की टीम फीफा वर्ल्ड के क्वालीफाई राउंड मे छोटे छोटे देशो से पीछे रही जिनकी जनसंख्या करोड़ मे है वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई करते है जिनकी जनसंख्या हमारे एक छोटे से राज्य के बराबर है, ऐसा क्या हुआ इस हिंदुस्तान के खिलाड़ियों को, सम्बन्धित अधिकारियो को कुर्सी मे बैठे मठाधीश को की ऐसा लग रहा है कुछ नहीं किया गया | डॉ रावत ने अपने 47 साल के अनुभव से ये जाना की एक तो फुटबाल के पदों मे गंदी राजनीति हावी है राजनीति पार्टी के लोग पदों मे बैठकर हर 5 साल अपनी रोटी सेकते है खिलाडी, सिस्टम, वर्ल्ड रेंकिंग सबसे क्या मतलब हमें तो पैसा और कुर्सी मिल गयी मजे लेंगे हम कई वर्षो तक, ज़ब उच्च स्तर पर ही बड़ा तालाब गंदा है तो समस्त राज्यों की मछली भी गंदी ही होंगी आप कितना भी फिनायल या ब्लीचिंग पावडर डाल दो बड़े तालाब में उसमे इतनी गंदगी है की फिनायल और बिलिचिंग पावडर को खा जाती है उनको कोई फर्क नहीं पड़ता है ये सच्चाई है क्यों कि तालाब की इन समस्त मछलियों को केवल कुर्सी और पैसा चाहिए ना की खिलाड़ियों के लिए अच्छा सिस्टम,
ऐसा नहीं है की हिंदुस्तान मे अच्छे खिलाडी, अधिकारी नहीं है, है बहुत वो कुछ करना चाहते है लेकिन उनकी आवाज को किसी भी तरह से बंद कर दिया जाता है मानसिक शोषण देकर, कुछ अच्छे लोग हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट चले जाते है की कभी तो सिस्टम बने कभी तो होनहार खिलाड़ियों के लिए कुछ अच्छा हो,लेकिन वो भी लंबी लड़ाई लड़ते लड़ते इस दुनिया से चले जाते है लेकिन गंदी मछलियां जिंदा रहती है या नई पैदा हो जाती है, चमचागिरी, पद का लालच, कुर्सी का लालच , पैसे का लालच ही इंसान को आलसी और कामचोर बना देता है, रावत ने कहा कि आजकल एक प्रथा और चल रही खिलाडी को नेशनल खिला कर चाहे फुटबाल मे शॉट मारनी नहीं आती हो बस सर्टिफिकेट मिला नौकरी मिली खुश, दूसरा कोच बनना है तो डी, सी, बी, ए आदि कोच का सर्टिफिकेट कोर्स कराये पैसा lo नौकरी पक्की जबकि कोचिंग ए बी सी का पता नहीं, तीसरा रेफरी का एक से लेकर 8 लेवल तक कोर्स करो सर्टिफिकेट दो नौकरी करो ख़ुश चाहे रेफरी का कोई अनुभव नहीं बस सब जुगाड़ से हर सर्टिफिकेट ले लिया जाए |डॉ रावत ने बताया की यूरोप के देशो मे फुटबाल क्यों प्रसिद्ध है क्यों कि वहाँ की सरकार, हर अधिकारी, खिलाडी, कोच, रेफरी ईमानदार है पूरी मेहनत से सर्टिफिकेट और नौकरी करता है कई वर्षो तक, जिससे वहाँ की फुटबाल इन तीन पर निर्भर होती है, खिलाड़ियों के लिए अच्छी सुविधा, कोच के लिए बेहतरीन ट्रेनिंग, रेफ्रीयों के अच्छा वर्कशॉप होता है क्या ये सब सिस्टम हम हिंदुस्तान मे नहीं कर सकते कर सकते है लेकिन करेगा कौन ज़ब उच्च स्तर पर सिस्टम जब तक नहीं सुधरेगा हमारा फुटबाल भी कही भी आगे नहीं बढ़ेगा |

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