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जूनून और साहस के आगे झुकी दिव्यांगता

भरतपुर | राजस्थान में दिव्यांग खिलाड़ियों की प्रतिभा किसी पहचान की मोहताज नहीं है | कोई ट्रेन दुर्घटना में अपना हाथ गंवा बैठा, किसी का हाथ बचपन में करंट लगने से कट गया तो कोई जन्मजात दिव्यांगता के साथ जीवन की चुनौतियों से लड़ रहा है | इन तमाम मुश्किलों के बावजूद ये खिलाड़ी खेल के मैदान में अपने सपनों को जिंदा रखे हुए हैं. प्रदेश के अलग-अलग जिलों के पैरा खिलाड़ियों ने अपने संघर्ष, उपलब्धियों और व्यवस्था की कमियों को खुलकर सामने रखा | बालोतरा निवासी शिल्पा भाटी की कहानी बेहद मार्मिक है | उन्होंने बताया कि बचपन में उनकी गर्भवती मां उन्हें और उनके भाई को लेकर अस्पताल जा रही थी | जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर अचानक उनकी मां बेहोश होकर गिर गई | इसी दौरान शिल्पा और उनका भाई प्लेटफॉर्म से नीचे रेल पटरी पर जा गिरे | तभी ट्रेन आ गई और शिल्पा का दाहिना हाथ कोहनी के पास से कट गया.शिल्पा बताती हैं कि उनके पिता बीएसएफ में कार्यरत थे, लेकिन अब माता-पिता दोनों का साया उनके सिर पर नहीं है. परिवार की जिम्मेदारी भाई उठा रहा है, जो निजी नौकरी करता है | दुर्घटना के बावजूद शिल्पा ने हार नहीं मानी | उन्होंने विपरीत हालातों के बाद भी खेलों की दुनिया में कदम रखा. उन्होंने एथलेटिक्स में राज्य स्तर पर सिल्वर मेडल जीता है और अब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना देख रही हैं | जयपुर की आशा शर्मा जन्मजात दिव्यांग हैं | उन्होंने बताया कि उनका और उनकी जुड़वां बहन का जन्म ऑपरेशन से हुआ था. इसी दौरान हाथ की हड्डी टूट गई | बाद में प्लास्टर के दौरान ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित हुआ और उनका हाथ स्थायी रूप से प्रभावित हो गया. आशा राष्ट्रीय स्तर तक खेल चुकी हैं और राज्य स्तर पर कई पदक जीत चुकी हैं. हालांकि, उनका दर्द है कि कई बार खिलाड़ियों के साथ पक्षपात होता है और उन्हें अवसर नहीं मिलता. उन्होंने कहा कि पैरा खिलाड़ियों को सरकार की ओर से पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलतीं | पदक जीतने के बाद पुरस्कार राशि वर्षों तक अटकी रहती है. कई खिलाड़ी ओवरएज हो जाते हैं और नौकरी के अवसर भी हाथ से निकल जाते हैं | आशा के अनुसार राज्य में पैरा खिलाड़ियों के लिए न तो पर्याप्त कोच उपलब्ध हैं और न ही समर्पित खेल मैदान |

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