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कपाड़िया का चपरासी से चीफ जस्टिस बनने तक का सफर

मुंबई | भारत के एक ऐसे चीफ जस्टिस भी रहे हैं, जो बहुत गरीब पृष्ठभूमि से इस शीर्ष पद तक पहुंचे. करियर की शुरुआत एक चपरासी के तौर पर की | फिर क्लर्क बने. साथ में कानून की पढ़ाई की, उनके पिता अनाथालय में बड़े हुए थे | वह अपनी मेहनत और इंटैलिजेंस के बल पर सुप्रीम कोर्ट के 16वें चीफ जस्टिस बने | उनके कई फैसले मिसाल की तरह लिये जाते हैं | उनका नाम था सरोश होमी कपाड़िया | बांबे के प्रतिष्ठित पारसियों के विपरीत उनके पिता सूरत के एक अनाथालय में पले-बढ़े थे | एक मामूली रक्षा क्लर्क के रूप में काम किया था | उनकी माँ कैटी एक गृहिणी थीं | परिवार मुश्किल से गुजारा कर पाता था | युवा सरोश ने तय कर लिया था कि वह अपना भाग्य खुद बनाएगा. वह जज बनना चाहता था और कुछ नहीं | शुरू से ही उनकी दिलचस्पी कानून से जुड़े पहलुओं में थी | कपाड़िया के क्लर्क से वकील बनने | फिर बांबे हाईकोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश बनने की भी एक कहानी है| जो कहती है कि अगर आपमें प्रतिभा है और मेहनत करने के माद्दा के साथ दृढ इच्छाशक्ति है तो आप कहीं तक भी पहुंच सकते हैं | कपाड़िया 23 मार्च 1993 को बांबे हाईकोर्ट में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए | 5 अगस्त 2003 को उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने | 18 दिसंबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट में जज बने | 12 मई 2010 को उन्हें राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई. 29 सितंबर 2012 को सेवानिवृत्त हुए | उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस के पद पर पहुंचने के बाद स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर एक भाषण में कहा, “मैं एक गरीब परिवार से आता हूं| मैंने अपना करियर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में शुरू किया | मेरे पास अकेली संपत्ति मेरी ईमानदारी है.”

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