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पशुपति नाथ काठमांडू को ज्ञापन देने का संकल्प लेते ही मची खलबली, जानिए खबर

 

 

मंदिर के पुजारी 26 जून को सम्पादक चंद्रशेखर जोशी से ज्ञापन लेकर पशुपति नाथ को पढ़कर सुनायेगे जागृत महादेव

देहरादून | शास्त्रों क अनुसार भगवान शिव में तीनों लोक समाहित है। भगवान शिव की कृपा जिस पर होती है, वह जीवन में कभी हार का सामना नहीं करता है।इनके नियमित और निरंतर जाप से आपके अंदर विलक्षण सिद्धियां जगती हैं। मंत्र ॐ अघोराय नम: ॐ पशुपतये नम: ॐ शर्वाय नम: ॐ विरूपाक्षाय नम: ॐ विश्वरूपिणे नम: इसे भी पढ़ें: 4 दिसंबर के राशिफल में जानिए क्या शुभ और अशुभ होगा, राशि के अनुसार ये है शुभ रंग और अंक ॐ त्र्यम्बकाय नम: ॐ कपर्दिने नम: ॐ भैरवाय नम: ॐ शूलपाणये नम: ॐ ईशानाय नम: ॐ महेश्वराय नम: अपनी योगमाया से फिर छह माह को एक रात मे बदल दो ‘जागृत महादेव’: विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक कोर्ट मे चंद्रशेखर जोशी के आहवाहन करते ही भोले नाथ के पूज्य सेवक पशुपति नाथ मंदिर काठमांडो, नेपाल से चंद्रशेखर जोशी सेवक माँ पीतांबरा बागुलामुखी का ज्ञापन लेने देहरादून चल दिये, 26 जून को भोलेनाथ के पुजारी चंद्रशेखर जोशी से “भोलेनाथ” पशुपति नाथ के नाम ज्ञापन लेकर काठमांडो, मंदिर लौटेंगे और शिवलिंग पशुपति नाथ को ज्ञापन सुनायेगे, तब तक आप एक वाक्या सुनिये

जागृत भोलेनाथ :
एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी। पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा – बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे। बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला – कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा – तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा – नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कहा – लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था – लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम।

सम्पादक चंद्रशेखर जोशी संपादक का महादेव पशुपति नाथ का आहवाहन

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