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2026 में FIFA वर्ल्ड कप खेल सकता है भारत यदि ….

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फ्रांस 20 साल बाद फीफा विश्व कप जीतकर फुटबॉल की दुनिया का बादशाह बन गया है. फाइनल मुकाबले में उसने 20वें स्थान की टीम क्रोएशिया को 4-2 से हराकर ट्रॉफी अपने नाम की. लेकिन छोटे से देश क्रोएशिया ने भी गजब का खेल दिखाया और 7वें स्थान की टीम फ्रांस के पसीने छुड़ा दिए. भारत में भी फीफा विश्व कप का फीवर सिर चढ़कर बोला. भारतीय फुटबॉल प्रेमियों ने टीवी सेट के सामने जमे रहकर अपनी पंसदीदा टीमों को सपोर्ट किया. लेकिन, क्या कभी भारत फीफा विश्व कप खेल पाएगा..? क्रिकेट, रेसलिंग, बॉक्सिंग, हॉकी, कबड्डी, बैडमिंटन जैसे खेलों में दुनिया के नक्शे पर भारका नाम सम्मान से लिया जाता है. लेकिन फुटबॉल का नाम सामने आते ही निराशा हाथ लगती है. इस ग्लोबल स्पोर्ट्स में हम अभी काफी पीछे हैं. फीफा रैंकिंग में भारत फिलहाल 97वां स्थान रखता है, लेकिन घाना, सीरिया, युगांडा जैसे देश हमसे आगे हैं. देखा जाए तो 42 लाख की आबादी वाला क्रोएशिया विश्व कप का उपविजेता है, ऐसे में भारत की आबादी तो करीब 300 गुना ज्यादा 130 करोड़ है.

कमी कहां रह गई?

देश में खेल संस्कृति नहीं है, ऐसा कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि दुनिया के 20 देश क्रिकेट खेलते हैं और हम उनमें अव्वल हैं. ओलंपिक से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों में कम ही सही, लेकिन भारत पदक जीत रहा है. एथलेटिक्स के इवेंट्स में भी भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन में सुधार हुआ है. लेकिन कहीं तो कमी जरूर है हमें यूरोप को कॉपी करना करना बंद करना पड़ेगा और फुटबॉल को फैशन से नहीं पैशन के साथ खेलना पड़ेगा. फीफा विश्व कप खेलने की संभावनाओं पर कहता हूँ कि इस सवाल पर लोग हम पर हंसते हैं, लेकिन भारत एक न एक दिन तो फुटबॉल विश्व कप जरूर खेलेगा. हमें देश में संस्थागत फुटबॉल लीग्स शुरू करनी पड़ेंगी, जिससे नई प्रतिभाओं को खोजा जा सके. उनका मानना है कि जब तक खिलाड़ियों को आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी, तब तक गांव-कस्बों के मध्य और निम्नवर्गीय परिवार के बच्चे फुटबॉल की ओर आकर्षित नहीं होंगे.

नहीं हुआ खेल का प्रसार

देश में फुटबॉल की प्राइवेट लीग्स के बारे में कहना है कि इन टूर्नामेंट्स में स्थानीय खिलाड़ियों के लिए जगह ही कहां है. यहां विदेशी और क्लबों से आए खिलाड़ी ही जगह पाते हैं जिससे फुटबॉल सिर्फ कुछ राज्यों और क्लबों तक सीमित रह गया है. भारत में अंडर-17, 20 जैसे और फुटबॉल विश्व कप कराने की जरूरत है, ताकि भारत के युवा खिलाड़ियों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके. हमने एक जमाने मै जापान और सऊदी अरब जैसी टीमों को हराया है, यह हमारे सामने टिकते नहीं थे. उस दौर में ओएनसीजी, एसबीआई, पीएनबी की टीम काफी मजबूत हुआ करती थी और वहीं से खिलाड़ी निकलकर आते थे. लेकिन जब से संस्थागत लीग्स बंद हो गईं, तब से नई प्रतिभाओं को मौका मिलना कम हो गया है. सरकार को खेल कोटा बंद नहीं करना चाहिए 4% स्पोर्ट्स कोटा जो पहले था उसको लागू करना चाहिए. खेल मंत्रालय को ज्यादा से ज्यादा इंस्टीट्यूशन लीग्स करानी चाहिए.

हमारे लिए सुनहरा मौका

फीफा ने तय किया है कि 2026 विश्व कप में 32 की बजाय 48 टीमें खेलेंगी और एशिया से तब 8 टीमों को मौका मिलेगा, जहां अभी से सिर्फ 4 टीमें ही खेलती हैं और यही हमारे लिए एक सुनहरा मौका होगा. वह बताते हैं कि 50-60 के दशक में भारतीय फुटबॉल टीम काफी अच्छी थी, लेकिन हाल के दिनों में हम काफी पिछड़ गए. अगर खिलाड़ी और मेहनत करते हैं तो हम 2026 में विश्व कप जरूर खेल सकते हैं. हमारी अंडर-17 की टीम एशिया में काफी अच्छा कर रही है लेकिन राष्ट्रीय टीम को एशिया की 8 टीमों में जगह जरूर बनानी होगी. इसके लिए हमें ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने होंगे और एक नहीं कम से कम 3 राष्ट्रीय टीमें तैयार करनी होंगी. क्योंकि कई टीमों से हमारे पास विकल्प बढ़ जाते हैं और खिलाड़ियों का चयन नाम से नहीं बल्कि उनके प्रदर्शन के आधार पर हो सकता है. देश में फुटबॉल के लिए रुझान बढ़ रहा है. देश में मैदान और सुविधाएं नहीं हैं यह कहना ठीक नहीं होगा. स्कूलों में पढ़ाई के अलावा खेलों को बढ़ावा मिले और माता-पिता इसमें बच्चों की मदद करें, तब जाकर देश में फुटबॉल को और आगे ले जाया सकता है. 2026 में फीफा टीमें बढ़ाएगा और एशियाई टीमों का कोटा 4 से 8 हो जाएगा. लेकिन भारत को फिर भी एशिया के टॉप 10 में आना ही पड़ेगा. तभी हम फीफा विश्व कप खेल सकते हैं. खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ भी पिछले दिनों यह कह चुके हैं कि भारत भले ही फीफा विश्व कप नहीं खेला हो, लेकिन खिलाड़ियों के पास क्षमता जरूर है. हमें खिलाड़ियों के लिए मौके उपलब्ध कराने होंगे. राठौड़ ने कहा कि अगर क्षमता और मौकेों को मिला दिया जाए तो भारत जल्द ही फीफा विश्व कप खेल सकता है.

मैदान में नहीं दर्शक

इन सभी उम्मीदों से इतर एक सच्चाई यह भी है जो पिछले दिनों भारत में आयोजित इंटर कॉन्टिनेंटल कप के दौरान दिखी. तब भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान सुनील छेत्री को ट्विटर पर लोगों से मैदान पर मैच देखने के लिए आने की भावुक अपील करनी पड़ी. देश में बाजार और लोकप्रियता क्रिकेट को मिली है, लेकिन उसकी वजह विराट कोहली, रोहित शर्मा सरीखे खिलाड़ी भी हैं. भारत में अगर क्रिकेट लोकप्रिय हुआ, तो उसके पीछे स्टार क्रिकेटरों का भी अहम योगदान है. दूसरी तरफ फुटबॉल में ऐसा देखने को नहीं मिलता. यही वजह है कि दर्शकों का रुझान भी उस तरफ कम है. हालांकि वह उम्मीद जताते हैं कि 2026 में अगर फीफा टीमों का दायरा बढ़ाता है तो भारत के लिए जरूर मौका बनेगा. खिलाड़ियों के पास सुविधाओं का अभाव है और मैनेजमेंट उन्हें वो वर्ल्ड क्लास सुविधाएं देने को तैयार नहीं है. खिलाड़ी डेविड बेकहेम जैसा बने, लेकिन वक्त और पैसा खर्च करने के लिए कोई तैयार नहीं है. अगर बच्चों को पैसा और सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो मुफ्त में कौन जान देने को तैयार होगा.  सोसायटी के लिए है हमारी सोसायटी शायद अभी इसके लिए तैयार नहीं है. वह कहते हैं कि खेल समाज का आईना है और फुटबॉल समाज के लिए ही है. मतलब जब तक माता-पिता अपने बच्चों के फुटबॉल के लिए भेजने को तैयार नहीं होंगे, हम किसी के घर से बच्चों को उठाकर तो नहीं ला सकते. राज्यवर्धन राठौड़ के खेल मंत्री बनने के बाद से काफी कुछ बदल रहा है लेकिन फिर भी लंबा रास्ता तय करना है. उन्होंने कहा कि जब बच्चे टीवी पर यूरोपियन लीग देखकर कोचिंग लेने के लिए आते हैं तो उन्हें मैदान पर अलग की फुटबॉल दिखती है, उनके लिए यह वैसा बिल्कुल नहीं है जैसा कि वो देखकर आए थे. लेकिन वो यह जरूर मानते हैं कि हाल के दिनों में फुटबॉल के लिए हैवी करंट पनप रहा है जो इस खेल को आगे लेकर जाएगा

– वीरेन्द्र सिंह रावत
    सचिव

फुटबॉल फ़ेडरेशन उत्तराखंड

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