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आज हैं महाराष्ट्र के ब्रांड एम्बेस्डर जो कभी चाय बेचने को थे मजबूर …

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हम अपने बचपन के दिनों में अपनी दादा-दादी से किस्से-कहानियां सुना करते थे कि फलां के पास किस तरह एक भी पैसे नहीं थे | फलां ने किस प्रकार रात-रात भर जाग कर पढ़ाई की थी. उसे किस तरह पैसे के अभाव में मजदूरी करनी पड़ी. किस प्रकार रिक्शा खींचना पड़ा और चाय की रेहड़ी तक लगानी पड़ी | महाराष्ट्र राज्य के पुणे शहर में रहने वाले सोमनाथ गिरम के सफलता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है | वे एक बेहद गरीब परिवार में जन्मे थे और कभी दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष किया करते थे | सोमनाथ महाराष्ट्र प्रांत के सोलापुर जिले के रहने वाले सोमनाथ के पिता एक छोटे किसान हैं और उन्होंने अपना बचपन बेहद गरीबी में गुजारा है |वे अपनी पढ़ाई (ग्रेजुएशन) भी गांव में पूरी नहीं कर सके. उन्हें जब गांव के आसपास के इलाके में कोई पार्ट टाइम नौकरी भी नहीं मिली तो किसी दोस्त की सलाह पर वे साल 2008 में पुणे का रुख कर गए |वहां उन्होंने दोस्त की सलाह पर सदाशिव पेठ इलाके में एक चाय स्टॉल (टपरी) खोली |उनके बिजनेस में उन्हें थोड़ा-बहुत फायदा हुआ और वे आगे की पढ़ाई के बारे में भी सोचने लगे | उनके द्वारा शुरू की गई चाय की दुकान उनके लिए जीविकोपार्जन का साधन बन गई. ग्रेजुएशन करने के बाद वे आगे की पढ़ाई करना चाहते थे |उन्होंने एमबीए करने के बारे में भी सोचा लेकिन उसके महंगे होने की वजह से उन्होंने उसके बारे में नहीं सोचा |उन्होंने सीए की परीक्षा देने का फैसला लिया |ज्ञात हो कि सीए को भारत के भीतर सबसे कठिन परीक्षाओं में शुमार किया जाता है | परीक्षा के दौरान तो वे कई बार अपनी दुकान संभालने के लिए दूसरों को हायर किया करते थे सोमनाथ कहते हैं कि वे रोज सबेरे ही चाय की दुकान लगा लिया करते थे और देर रात वहां से लौटते थे. पूरे दिन खड़े होने की वजह से वे बिल्कुल टूट जाया करते थे |इसके बावजूद भी वे रात के दो बजे तक पढ़ाई करते थे और फिर अगली सुबह दुकान खोलने को तैयार हो जाया करते थे |

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