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चुनाव आते ही राजनीतिक दलों को याद आने लगी मलिन बस्तियां

देहरादून । रिस्पना और बिन्दाल नदियों के किनारे बसी मलिन बस्तियों में लाखों लोग रह रहे हैं। चुनाव आते ही इन स्लम एरिया का महत्व बढ़ जाता है और सियासी दलों की भी नजरें इन पर गड़ जाती हैं। जानकार इन अवैध बस्तियों को राजनीतिक दलों की वोटों की खेती भी कहते हैं। उधर इन लोगों के मन में एक डर हमेशा बना रहता है कि चुनाव के बाद क्या इनके आशियाने छिन जाएंगे। प्रदेश की करीब 584 मलिन बस्तियों में रह लोग भी आम चुनावों में काफी हद तक सियासी दलों को प्रभावित कर सकते हैं. इन एरिया में करीब 12 लाख के लोग रहते है जो अच्छा-खासा बड़ा वोट बैंक है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद इन लोगों में डर है कि उनका आशियाना छिन जाएगा। उधर सरकार रिवर फ्रंट योजना से नदियो के किनारों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की योजना बना रही है और नदियों के डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों को मकान के बदले फ्लैट देने का वादा किया गया है। लेकिन इन बस्तियों में रह रहे लोगों का कहना है कि उन्हें फ्लैट नहीं वही घर चाहिए जिसमें वह रह रहे हैं। चुनाव करीब है तो राजनीतिक दलों को भी इन लोगों की या इनके वोटों की चिंता है। भाजपा प्रवक्ता वीरेंद्र बिष्ट दावा करते हैं कि भाजपा ने कभी भी गरीबों की उपेक्षा नहीं की, हमेशा साथ ही दिया है. बिष्ट कहते हैं कि नदियों को पुनर्जीवित करना है तो डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों का विस्थापन करना ही पड़ेगा। वह डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों को आश्वासन देते हैं कि उनके लिए डरने की कोई बात नहीं है क्योंकि बीजेपी सरकार उनके लिए कोई व्यवस्था करेगी तभी उन्हें हटाया जाएगा। देहरादून में ही रिस्पना, बिंदाल नदियों के किनारे करीब 2 लाख से अधिक वोटर रहते हैं जिनका साथ जीत के लिए जरूरी है। अपने आशियाने को गंवाने के डर से फिलहाल ये लोग मौजूदा सरकार से खफा नजर आ रहे हैं। कांग्रेस इनकी नाराजगी को कितना कैश कर पाती है या बीजेपी इनको समझा-बुझा कर कितना अपने पाले में ला पाती है यह देखना दिलचस्प होगा।

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