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पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना तथा जन सुविधाओं के विकास पर विशेष बल देने की जरूरी : सीएम त्रिवेंद्र


ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की टीम ने मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को सौंपी
रिपोर्ट

देहरादून | ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की टीम द्वारा राज्य में ग्राम्य विकास के क्षेत्र में योजनाओं का विश्लेषण करने के बाद एक रिपोर्ट मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को सौंपी गई। आयोग द्वारा तैयार की गयी 5वीं रिपोर्ट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सिफारिशें की गयी हैं ताकि पलायन को कम किया जा सके। इस अवसर पर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकना तथा जन सुविधाओं के विकास पर ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है, यह हमारे लिये एक बड़ी चुनौती भी है। मुख्यमंत्री ने इस दिशा में पलायन आयोग द्वारा अब तक किये गये प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उनके सुझावों पर राज्य सरकार द्वारा प्रभावी पहल की जायेगी। उन्होंने कहा कि हमारे गांव व खेती आबाद हो, इसके लिये व्यापक जन जागरूकता जरूरी है। मुख्यमंत्री ने न्याय पंचायत स्तर पर कृषि विकास से संबंधित विभागों के अधिकारियों की टीम बनाये जाने की भी जरूरत बतायी। उपाध्यक्ष, ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग डाॅ. एस.एस.नेगी द्वारा दिये गये सुझावों में प्रदेश में एम.ए.एन.आर.ई.जी.ए. के तहत 50 प्रतिशत से अधिक लाभार्थी महिलाएँ हैं, ये महिलायें अतिरिक्त आय सृजित कर सकें, इसके लिए समान अवसर और भागीदारी सुनिश्चित करके सभी जनपदों के लिए महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50रू से अधिक बनाए रखने के प्रयास किए जाने चाहिए। महिलाओं के कौशल विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि वे कुशल श्रमिकों के रूप में लाभ उठा सकें। उन्होंने बताया कि फसलों को बंदर और जंगली सूअर जैसे जानवरों द्वारा नुकसान होने की समस्या है। कुछ ब्लाॅक में जंगली सूअरों से सुरक्षा के लिए दीवारें बनाई जा रही हैं, सभी जनपदों में ऐसा किया जाना आवश्यक है। बंदरों से फसलों की सुरक्षा के लिए संपत्तियां बनाने के लिए एक योजना वन विभाग की सहायता से तैयार की जानी चाहिए। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए पानी की कमी एक बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। इस समस्या से निपटने के लिए इस योजना के तहत कार्यों का संयोजन किया जा सकता है। उत्तराखंड में औषधीय और सुगंधी पौधों की अच्छी क्षमता है लेकिन वर्तमान में वह राज्य में एक लाभकारी गतिविधि के रूप में नहीं उभर रहा है। राज्य में इसकी वास्तविक क्षमता का लाभ उठाने के और इसे महत्वपूर्ण आजीविका उत्पादन गतिविधि में से एक में बदलने के प्रयास किए जाने चाहिए। स्वयं सहायता समूहों द्वारा बनाए गए उत्पादों के लिए गुणवत्ता निगरानी और प्रमाणन किया जाना चाहिए। इससे मानकीकरण होगा और सार्वभौमिक बाजार खुलेगा। उत्पादों के विपणन और खुदरा के लिए गतिशील आॅनलाइन प्लेटफाॅम विकसित किए जाने चाहिए। एक सोशल मीडिया रणनीति विकसित की जानी चाहिए। सैनिटरी पैड बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह विकसित किए जा सकते हैं। प्रत्येक जनपद में एक इकाई की स्थापना की जा सकती है। बिखरे हुए पर्वतीय क्षेत्रों में संयोजन के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जाना आवश्यक है, ताकि सामूहिक उत्पादन में सुधार किया जा सके। संयोजन के माध्यम से बनाई गई संपत्तियों का अनुश्रवण किया जाना चाहिए और उचित रखरखाव किया जाना चाहिए ताकि वे क्षेत्र में फायदेमंद साबित हों। उन जनपदों पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए जो कम विकास दर्शाते हैं। संस्करण केन्द्रों, पैकेजिंग और नर्सरी विकास के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की क्षमता रखने वाले कौशल प्रदान किए जाने चाहिए। पर्वतीय जनपदों में ग्राम विकास अधिकारी के रिक्त पदों की संख्या मैदानी जनपदों और व्यक्तिगत रूप की तुलना में अधिक है। इन्हें भरे जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं को ऋण सुविधा उपलब्ध कराने के लिये जमीनी कागजों में पति-पत्नी का नाम सामान्य किये जाने पर भी बल दिया है। उन्होंने कहा कि उनके स्तर पर किये गये सर्वेक्षण 36 ब्लाॅकों के 152 गाँवों की आय में लगभग 25 प्रतिशत का अन्तर महसूस किया गया है।

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