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पहचान : पिता मोची तो मां करती थी दिहाड़ी मजदूरी, बेटे ने खड़ा कर दिया करोड़ों का साम्राज्‍य

 

महाराष्ट्र | अशोक खाड़े का जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके परिवार में कुल मिलाकर छह बच्चे थे। कई बार तो उन्हें खाना भी नहीं मिलता था। परिवार को खाली पेट सोना पड़ता था। ऐसे में अशोक का संघर्ष बचपन में ही शुरू हो गया था। उनके पिता बेहतर नौकरी पाने के लिए मुंबई चले गए। फिर वहां मोची का काम करने लगे। मुंबई की सड़कों पर पेड़ के नीचे बैठकर जूते और चप्पल बनाने में वह घण्टो बिताया करते थे। लेकिन, यह भी परिवार के भरण-पोषण के लिए नाकाफी होता था। 7वीं कक्षा के बाद अशोक एक अलग स्थानीय स्कूल में स्थानांतरित हुए जहां उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। वह इस बात पर ठीके थे कि उनकी घोर गरीबी से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता शिक्षा है। बोर्ड परीक्षा समाप्त करने के बाद वह अपने बड़े भाई के पास रहने के लिए मुंबई चले गए। इस बीच उनके भाई ने मझगांव डॉकयार्ड में अप्रेंट‍िस वेल्डर के रूप में रोजगार हासिल कर लिया था। भाई ने उनका कॉलेज में दाखिला करा दिया। उन्हें जरूरी आर्थिक मदद के लिए भी कहा। चार साल बाद उन्हें स्थायी ड्राफ्ट्समैन के रूप में नियुक्त किया गया। अशोक का मासिक वेतन बढ़कर 300 रुपये हो गया। फिर भी अशोक ने अपने जीवन में कुछ बड़ा करने की इच्छा बनाए रखी। यही कारण था कि वह अपनी आगे की शिक्षा पूरी करना चाहते थे। लिहाजा, उन्होंने काम करते हुए एक डिप्लोमा कार्यक्रम में दाखिला लिया। इसी के साथ ग्रेजुएशन किया। चार साल तक सेवा करने के बाद अशोक को डॉक के क्‍वालिटी कंट्रोल डिवीजन में ट्रांसफर कर दिया गया। उन्हें कॉरपोरेशन से जर्मनी की यात्रा और जानी-मानी प्रौद्योगिकियों को देखने का मौका मिला। फिर उन्‍होंने अपने जीवन के मकसद को स्पष्ट रूप से समझ लिया। भाई के साथ मिलकर अशोक ने भारत में अपनी खुद की कंपनी ‘दास ऑफशोर इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड’ की शुरुआत की। पहले उन्हें कठिनाइयां हुईं। लेकिन, कुछ समय बाद मेहनत रंग लाई। यह कंपनी अपने सेक्‍टर की जानी-मानी फर्म बन गई। इसके ग्राहकों में ओएनजीसी, ब्रिटिश गैस, हुंडई, एस्सार, एलएंडटी और अन्य शामिल हैं। कंपनी ने अब तक 100 समुद्री परियोजनाएं पूरी कर ली हैं। इस कंपनी का कई सौ करोड़ रुपये का कारोबार है।

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