पहचान : गरीबी का संघर्ष फिर जीवन का संघर्ष, हौसलों से यामिनी मौर्य बनीं देश की की ‘सिल्वर गर्ल’
सपने बड़े हों और हौसले मजबूत, तो अभाव भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक पाते। एमपी के सागर की बेटी यामिनी मौर्य ने इसका जीता-जागता उदाहरण पेश करते हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में जूडो का ‘सिल्वर मेडल’ जीतकर देश और प्रदेश का नाम रोशन कर दिया। बुंदेलखंड अंचल की बेटी यामिनी मौर्य ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में इतिहास रच दिया है। महिलाओं की 57 किग्रा जूडो स्पर्धा में यामिनी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के लिए सिल्वर मेडल हासिल किया है। सागर के छावनी पुरानी सदर की रहने वाली यामिनी की यह सफलता किसी करिश्मे से कम नहीं है। सरकारी स्कूल से निकलकर, गंभीर चोट, पैर टूटने और आर्थिक तंगी को मात देकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची यामिनी की कहानी पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है।’अभावों में जन्मीं, लेकिन सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया…’ सागर की बेटी यामिनी मौर्य ने 2026 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो की 57 किलोग्राम भार वर्ग स्पर्धा में देश और प्रदेश का मान बढ़ाया है। कड़े और रोमांचक मुकाबले के बाद यामिनी ने भारत की झोली में रजत पदक डाला। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद सागर से लेकर पूरे मध्य प्रदेश में जश्न का माहौल है। यामिनी सागर के एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता हरिओम मौर्य छोटे किसान हैं। तंगहाली के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों से कभी समझौता नहीं किया। यामिनी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई स्थानीय सरकारी स्कूल से की।





















