गुरू शिष्य में पात्र-कुपात्र नहीं देखते, ‘सुपात्र’ बना देतेः अनीता भारती
देहरादून। ‘दिव्य गुरू आशुतोष महाराज’ की ‘कृपा छांव’ में आज एक बार फिर से ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’ के निरंजनपुर स्थित आश्रम सभागार में भक्तों-साधकों के बुलंद जयघोष गुंजायमान हुए। अवसर था संस्थान द्वारा प्रत्येक रविवार को आयोजित किए जाने वाले साप्ताहिक सत्संग-प्रवचनों तथा मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का। सदा की भांति कार्यक्रम की शुरूआत मंचासीन ब्रह्मज्ञानी संगीतज्ञों द्वारा प्रस्तुत किए गए अनेकों भजनों की सरस प्रस्तुति देते हुए की गई। संगत भावपूर्ण भजनों से निहाल होती रही। मंच संचालन करते हुए भजनों की गूढ़ मिमांसा साध्वी विदुषी सुभाषा भारतीके द्वारा की गई। साध्वी जी ने उपस्थित भक्तजनों को सम्बोधित करते हुए बताया कि सत्संगति जिसे प्राप्त हो गई उसकी तो अनेक कुलों का तारण आरम्भ हो जाता है। जिस ‘बड़भागी’ मनुष्य को सत्संग रास आ गया तो उसके प्रयास से उसकी भावी पीढ़ियां भी निश्चित रूप से सत्संग में रूचि लेंगी ही, क्योंकि! वे अपने पूर्वज के दर्शाए मार्ग का अवश्य ही अनुगमन करेंगी। साध्वी जी ने कहा कि जन्मों-जन्मों से मैला मन किन्हीं बाहरी साधनों से पवित्र-पावन नहीं होने वाला, इसकी मलिनता को दूर करने का सर्वोत्तम अमोघ उपाय तो पूर्ण गुरू का सत्संग ही है। सत्य का संग जब हो जाता है तब इंसान गुरू के पावन ‘ब्रह्मज्ञान’ की प्राप्ति की ओर बढ़ता ही है, और उसका यह बढ़ना ही उसे ईश्वर तक पहुंचा देता है। साध्वी जी ने आगे बताया कि गुरू ‘अमृत की खान’ की तरह होते हैं। जब शिष्य गुरू चरणों में अपना शीश झुकाता है तब उसका अहंकार तो स्वतः ही झुक जाता है। शीश को अहंकार का प्रतीक बताते हुए साध्वी जी ने कहा कि जब तक सर अपने आराध्य के चरणों में नहीं झुकता तब तक यह अहंकार का ही रूप धरकर सदा तना रहता है। गुरू चरणों में झुककर ही इस शीश का महत्व है। इस संबंध में शास्त्र यह सुन्दर पंक्तियां उदघोषित करता है- ‘‘यह तन विष की बेलरी गुरू अमृृृत की खान, शीश दिए जो गुरू मिलें तो भी सस्ता जान।’’
अपने आज के सत्संग उद्बोधन में ‘दिव्य गुरू आशुतोष महाराज जी’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी अनीता भारती ने ‘पुनः मूषक भवः’ की रोचक कथा को भक्तों-साधकों के समक्ष रेखांकित करते हुए इसकी शुरूआत करी। उन्होंने बताया कि एक ऋषि जब तपस्या कर रहे थे तब एक चूहा प्राण बचाने के लिए उनके पीछे छुपने लगा, तब करूणावश बिल्ली से भयभीत उस चूहे को उन्होंने अपने तपोबल से बिल्ली बना दिया। अब बिल्ली कुत्ते से डरती है तो ऋषि जी ने उसे कुत्ता बना दिया। अब कुत्ते की जान का दुश्मन बना बैठा था शेर। कुत्ते को उन्होंने शेर बना डाला। लेकिन! शेर बनते ही उस भूखे शेर को ऋषि एक शिकार के रूप में दिखाई देने लगे। शेर उन पर झपटे इससे पूर्व ऋषि जी ने तुरन्त इस मंत्र का उच्चारण करते हुए उस शेर को उसके मूल स्वरूप अर्थात चूहे में ही तब्दील कर दिया। मंत्र था ‘पुनः मूषक भवः।’ साध्वी जी ने बताया कि एैसा ही कुछ-कुछ भक्ति मार्ग पर अग्रसर भक्तों के साथ भी दृष्टिगोचर हुआ करता है। भिन्न-भिन्न शरीरों में अलग-अलग प्रवृत्तियां उनके मूल स्वभावानुसार प्रकट होती ही हैं। महापुरूष सम्पूर्ण मानव समाज को एकता के सूत्र मेें बांधने के लिए ही संसार में आते हैं। उनका एकमात्र ‘दिव्य सूत्र’ होता है सनातन ब्रह्मज्ञान। भीतर की दूष्प्रवृत्तियों को मिटाकर आत्मा के मूल स्वरूप में शिष्य को आरूढ़ कर देने के लिए वे ईश्वर गुरू रूप में इस धराधाम पर अवतरित हुआ करते हैं। विकारों-बुराईयों से हृदय को परिष्कृत कर गुरूदेव शिष्य को ईश्वरीय धाम का अधिकारी बनाते हैं। विदुषी जी ने अनेकों प्रेरक दृष्टांतों के साथ-साथ श्री योगानन्द परमहंस से संबंधित वृतांत भी सुनाया और कहा कि दिव्य गुरूदेव शरणागत शिष्य के गुण-अवगुण अथवा पात्र-अपात्र-कुपात्र कुछ भी नहीं देखते बल्कि वे तो कुपात्र को भी ‘सुपात्र’ बना देने की अपार क्षमता रखते हैं।





















