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हिंसा से बचें, आत्मा को पहचाने : आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी

 

परमात्मा पद की ओर बढ़ें : आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी

देहरादून। परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी के पावन सान्निध्य में श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर एवं जैन भवन, देहरादून में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम श्रद्धापूर्वक आयोजित किए जा रहे हैं। भक्तों द्वारा नित्य नियम पूजन के साथ जैन मिलन भाग्य ज्योति एवं जैन मिलन महावीर की ओर से परम पूज्य आचार्य श्री की पूजा-अर्चना श्रद्धापूर्वक की गई। साथ ही बाहर से आए हुए अतिथियों का श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति द्वारा स्वागत व सम्मान किया गया। तत्पश्चात धर्मसभा का शुभारंभ पूज्य आर्यिका रत्न श्री पूर्णमति माताजी द्वारा णमोकार महामंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ किया गया।धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरुमाँ ने कहा कि जीवों की हिंसा निरंतर बढ़ती जा रही है और इसके परिणामस्वरूप अनर्थदंड तथा पाप कर्मों का बंध भी बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि जीवों की हिंसा हो रही है तो यह समझना भूल है कि उसका कोई कर्मफल नहीं मिलेगा। प्रत्येक हिंसा पाप की गठरी को और भारी करती है। उन्होंने कहा कि कभी-कभी अचानक आने वाली बीमारियों और अनेक प्रकार के संकटों को भी कर्म सिद्धांत के संदर्भ में समझने का प्रयास करना चाहिए। जिन जीवों को हमने कष्ट दिया या मारा, वही जीव अन्य रूपों में हमारे सामने आकर हमारे लिए कष्ट का कारण बन सकते हैं। यह कर्म सिद्धांत है और जैन धर्म हमें इसी सिद्धांत को समझने का मार्ग दिखाता है।

पहले अपने आपको आत्मा के रूप में स्वीकार करो 

माताजी ने कहा कि सबसे पहले अपने आपको आत्मा के रूप में स्वीकार करो। जब मनुष्य स्वयं को आत्मा के रूप में स्वीकार करेगा, तभी परमात्मा पद की ओर आगे बढ़ सकेगा। उन्होंने कहा कि दुनिया में सुख और शांति की तलाश में हम अनेक स्थानों पर भटकते रहते हैं, दवाओं और उपचार पर धन खर्च करते रहते हैं, लेकिन अपने भीतर स्थित आत्मतत्व को पहचानने का प्रयास नहीं करते।

मसूरी के वॉटरफॉल का उदाहरण देते हुए गुरुमाँ ने कहा कि लोग पानी के झरने को देखने के लिए बड़ी संख्या में जाते हैं और ऊपर से नीचे गिरते पानी को देखकर प्रसन्न होते हैं। लेकिन हमें यह भी विचार करना चाहिए कि उस जलधारा में निरंतर पानी की जलधारा के साथ नीचे गिरते हुए जीवो को हत्या होती है । दूसरी ओर, मसूरी में विराजमान प्राचीन जैन मंदिरों और भगवान चंद्रप्रभु की प्रतिमा के दर्शन के लिए हम उतनी श्रद्धा और उत्साह से नहीं जाते।उन्होंने कहा कि जहां अनमोल मोती अर्थात आत्मकल्याण का मार्ग मिलता है, वहां जाने के लिए समय नहीं है, जबकि कंकर-पत्थर और क्षणिक मनोरंजन वाले स्थानों पर भीड़ लगी रहती है। वहां हम धन और समय दोनों खर्च करते हैं और अनजाने में कर्मों का बंध भी करते जाते हैं।गुरुमाँ ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि आज के बाद किसी भी स्थान को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखने के बजाय उसके पीछे छिपे जीवदया, अहिंसा और आत्मकल्याण के संदेश को समझने का प्रयास करें। जैन धर्म हमें प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, अहिंसा और आत्मचिंतन का मार्ग दिखाता है।

धार्मिक कार्यक्रमों की जानकारी

कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि 2 सितंबर को जिनवाणी जागृति मंच द्वारा परम पूज्य आचार्य श्री की पूजा-अर्चना श्रद्धापूर्वक की जाएगी।उन्होंने बताया कि वर्षायोग के दौरान प्रतिदिन पूज्य माताजी की आहारचर्या, नित्य सामायिक, नित्य पाठशाला, सायंकालीन महाआरती, शंका-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जा रहे हैं। इस अवसर पर जैन समाज के अनेक श्रद्धालु, श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति तथा सकल दिगम्बर जैन समाज, देहरादून के अनेक सदस्य एवं पदाधिकारीगण उपस्थित रहे।

 

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