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नए भारत के मजदूरों की आर्थिक स्थिति!

 

जरा हटके | देश में 2016 के बाद प्राइवेट क्षेत्र सहित असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की असली स्थिति पर नजर रखने वाले कई एक्सपर्ट की मानें तो नोटबंदी के बाद से ही इम करोड़ों लोगों की जिंदगी में तरक्की की राह बहुत कठिन हो गई थी, उसके बाद जीएसटी जैसे कठिन कदम से भी तमाम लोगों की तरक्की पर लगाम लगी या कहें लगाई गई, अब आया 2020 का कोरोना महामारी काल जिसमें आप सब जानते हैं क्या आम क्या खास सबकी बत्ती गुल कर दी, लेकिन इसको लेकर भी एक्सपर्ट्स ने चिंता जताते हुए कहा कि हमें उम्मीद थी कि कुदरत के इस कहर को सरकारें मरहम लगाएंगी और कुछ कम करेंगी मगर पूरे देश में एक दो प्रदेशों को छोड़कर सबका रवैया एक जैसा ही था सबने इस वर्ग को उनके हाल पर छोड़ दिया था। राज्यों की ही तरह केंद्र सरकार ने भी 5 किलो राशन देकर और तीन माह 5 सौ रुपये खाते में जमा कर मरने को छोड़ दिया गया, दुसरी तरफ जहां सैकड़ों पूंजीपतियों के लोन माफ कर दिए और टैक्स में भी छूट दी गई मगर इस प्राइवेट और असंगठित क्षेत्र के मजदूर वर्ग की तरफ नही ध्यान दिया गया। एक्सपर्ट की मानें तो दुसरी तरफ रिजर्व बैंक का रिजर्व पैसे की भी बंदरबांट हुई, मगर यह वर्ग फिर भी अपनी तरक्की से अछूता रहा कहने को तो देश में गरीबी हटाने के लिए 70 के दसक से भी पहले से काम हो रहा है मगर इस वर्ग के साथ हमेशा अनदेखी हुई। जैसा कि हमने शुरू में ही जिक्र किया था 2016 के बाद की स्थितियों का तो मंहगाई भी दौर में सबसे अधिक बढ़ी है, कमाई उतनी है नही और पढ़ाई व दवाई की कीमतें आसमान छू रहे हैं वहीं दूसरी ओर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ही शादियों के समय में कर्ज मतलब कमाई, पढ़ाई, दवाई, और शादी जैसे हर काम में कर्ज के नीचे दबा जा रहा है क्योंकि इस दौर में रोजगार नौकरी जैसे मुद्दों पर बात होनी बंद हो गई है और धर्म की अफीम का नशा भी युवाओं के दिमाग में भरा गया है।

– सुशील सैनी
सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता

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