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जरा हटके : चारधाम यात्रा के दौरान करें माँ धारी देवी के दर्शन

 

देहरादून। चार धाम यात्रा का भव्य शुभारंभ अप्रैल में हो रहा है। पिछले वर्ष की तरह सुगम यात्रा इस वर्ष हो इसके लिए उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद ने पूरी तैयारी कर ली है। चार धाम यात्रा मार्गों में सुरम्य वादियों के बीच अनेक धार्मिक स्थल हैं जहाँ प्रकृति के साथ दैवीय दिव्यता की अनुपम अनुभूति प्राप्त होती है। इन्ही धार्मिक स्थलों में से एक है माँ धारी देवी का मंदिर। माँ धारी देवी का यह पवित्र मंदिर बद्रीनाथ सड़क मार्ग पर श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। 600 वर्ष प्राचीन यह मंदिर श्रीमद देवी भागवत के अनुसार 108 शक्तिपीठों में से एक है।
मान्याताओं के अनुसार प्राचीन समय में धारी माता की मूर्ति बाढ़ से बह गई थी और धारी गांव के पास चट्टानों के बीच फंस गई थी।  ऐसा माना जाता है कि धारी माता एक ग्रामीण के सपने में आयीं और उसे आदेश दिया कि वह उनकी मूर्ति को नदी से बाहर ले आए और मूर्ति को वहीं स्थापित कर दे जहां वह मिली थी और उसे खुले आसमान के नीचे रखा जाना चाहिए।  इस प्रकार, मंदिर को धारी देवी मंदिर के रूप में जाना जाता है। यहाँ पुजारियों की मानें तो मंदिर में मां धारी की प्रतिमा द्वापर युग से ही स्थापित है। उनके  अनुसार, देवी का रूप समय के साथ बदलता है, जिसे देखकर लोग हैरान हो जाते हैं। वास्तव में मंदिर में मौजूद माता की मूर्ति दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है। मूर्ति सुबह में एक कन्या की तरह दिखती है, फिर दोपहर में युवती और शाम को एक बूढ़ी महिला की तरह नजर आती है।  धारी माता को उत्तराखंड में  चार धाम की संरक्षक और रक्षक के रूप में भी माना जाता है।  मंदिर में मूर्ति देवी धारी देवी का ऊपरी आधा हिस्सा है और निचला आधा कालीमठ में स्थित है जहां उन्हें काली अवतार के रूप में पूजा जाता है। वर्ष 2013 में अलकनंदा पावर प्लांट निर्माण के दौरान जून के महीने में देवी की मूर्ति को मूल स्थान से हटाकर  हटाकर अलकनंदा नदी से लगभग 611 मीटर की ऊंचाई पर कंक्रीट के चबूतरे पर स्थानांतरित कर दिया गया था जिसके फलस्वरूप क्षेत्र को उस वर्ष भयंकर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा था।  बादलों के फटने के कारण उत्पन्न बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे शहर व राज्य को क्षति पहुँचाई जिससे सैकड़ों लोग मारे गए थे।  भक्तों और स्थानीय लोगों का मानना था कि यह हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए रास्ता बनाने के लिए मूर्ति को उसके श्मूल स्थानश् से स्थानांतरित करने के कारण हुआ था। स्थिति को भाँपते हुए, मंदिर प्रशासन द्वारा पिछले माह मंदिर के स्तंभ को उठाकर मूल गर्भगृह को ऊँचा उठाकर मूर्ति को वापस से पुजारियों द्वारा विधिवत स्थापित किया गया है।

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